Sunday, March 15, 2026

प्रेम

ये पिंजरा है ज़रूरत का

स्वतंत्र तुम्हें देख सकता नहीं

जकड़ता है कर्तव्य की बेड़ियों में

सशक्त तुम्हें करता नहीं


जो जकड़ता है वो प्रेम नहीं 

जो भटकता है वो प्रेम नहीं

जो तड़पता है एक झलक को

आंखों में आंसू लिए

ऐसे प्रेम का परिचय देना

कठिन तो है असंभव नहीं


प्रेम का पिंजरा नहीं

प्रेम की डाली होती है

रुक्मणि - राधा के कृष्ण की

मीरा मतवाली होती है


न भय है दूर जाने का

न मोह है साथ रहने का 

विश्वास की जड़ों से उत्पन्न

निस्वार्थ भाव से सींचे गए

जीवन के वृक्ष की डाली होती है।

- मंजू

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