ज़िन्दगी की तस्वीर के
कुछ अंश धुंधले होते जा रहे हैं
सफ़र की शुरुआत जहां से हुई
वो लम्हे अतीत के आग़ोश में खोते जा रहे हैं
सफ़र में आगे बढ़ते हुए
कुछ नए अंश भी जुड़ते जा रहे हैं
किंकर्तव्यविमूढ़ हुआ जाता है मन
क्या करूं क्या नहीं
पुराने अंश देखूं तो
नए अंश नहीं दिखते
नए अंश देखूं तो
पुराने अंश नहीं दिखते
ज़िन्दगी का आधार है परिवर्तन
पर किस हद तक
स्वीकार्य है ये परिवर्तन ?
मन में सवालों का अंबार है
जवाब किसी एक का भी नहीं
चेतन मन इस अचेतन तस्वीर में
चेतना ला पाएगा या नहीं ?
ज़िन्दगी की तस्वीर के धुंधले अंश
साफ़ हो पाएंगे या नहीं
या नए अंश भी धीरे धीरे
धुंधले ही होते जाएंगे ?
- मंजू