Wednesday, May 7, 2025

उधार


बारिश से कह दो

कुछ बूंदें उधार दे दे


मुरझाए हुए पौधों को

जीवन का उपहार दे दे


ऊष्मा से तड़पते पक्षियों को

खुशियों की बौछार दे दे


रोते हुए चेहरों पर भी 

मुस्कान की बहार दे दे


इस आशाहीन जीवन को

आशाओं का अंबार दे दे


ऐ बारिश....

मुझे कुछ बूंदें उधार दे दे!



–मंजू

Saturday, March 29, 2025

तस्वीर

ज़िन्दगी की तस्वीर के
कुछ अंश धुंधले होते जा रहे हैं 
सफ़र की शुरुआत जहां से हुई
वो लम्हे अतीत के आग़ोश में खोते जा रहे हैं 

सफ़र में आगे बढ़ते हुए
कुछ नए अंश भी जुड़ते जा रहे हैं 
किंकर्तव्यविमूढ़ हुआ जाता है मन
क्या करूं क्या नहीं 

पुराने अंश देखूं तो 
नए अंश नहीं दिखते
नए अंश देखूं तो
पुराने अंश नहीं दिखते

ज़िन्दगी का आधार है परिवर्तन
पर किस हद तक
स्वीकार्य है ये परिवर्तन ?

मन में सवालों का अंबार है
जवाब किसी एक का भी नहीं
चेतन मन इस अचेतन तस्वीर में
चेतना ला पाएगा या नहीं ?

ज़िन्दगी की तस्वीर के धुंधले अंश
साफ़ हो पाएंगे या नहीं
या नए अंश भी धीरे धीरे 
धुंधले ही होते जाएंगे ?

- मंजू