ये पिंजरा है ज़रूरत का
स्वतंत्र तुम्हें देख सकता नहीं
जकड़ता है कर्तव्य की बेड़ियों में
सशक्त तुम्हें करता नहीं
जो जकड़ता है वो प्रेम नहीं
जो भटकता है वो प्रेम नहीं
जो तड़पता है एक झलक को
आंखों में आंसू लिए
ऐसे प्रेम का परिचय देना
कठिन तो है असंभव नहीं
प्रेम का पिंजरा नहीं
प्रेम की डाली होती है
रुक्मणि - राधा के कृष्ण की
मीरा मतवाली होती है
न भय है दूर जाने का
न मोह है साथ रहने का
विश्वास की जड़ों से उत्पन्न
निस्वार्थ भाव से सींचे गए
जीवन के वृक्ष की डाली होती है।
- मंजू