Saturday, September 17, 2022

इमारतें

कुछ छोटी तो कुछ आसमान छूती हैं
ये इमारतें भी कितनी अजीब होती हैं

जो जितनी ऊंचाई पर रहता होगा
उसका इंतज़ार उतना लम्बा ही होगा

एक तरफ़ वो ज़मीन से दूरी सहता होगा
दूजी तरफ़ सूरज से वो तपता होगा

पंछियों का शोर तो सुन लेता होगा
पर पशुओं की आवाज़ से वंचित रहता होगा

ये इमारतें हैं या क्षितिज धरती का
नींव है ज़मीन और शिखर आसमान-सा

ज़मीन नदियों-सी चंचल है
आसमान स्थाई है पत्थर-सा

चंचल ज़मीन भी थम जाती है
जब आसमान में हलचल होती है

बादलों की नदी जब बहती है
ख़ामोश आसमां में भी आवाज़ें होती हैं

बरसता है जब बादल बूंदें बनकर
ज़मीन की हलचल भी थम जाती है

प्रकृति में इस फेर-बदल की साक्षी
यही इमारतें बनती हैं

न जाने क्यों ये इमारतें
इतनी अजीब होती हैं

-मंजू

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