वो कहते हैं मेरी 'बात',
बिल्कुल समझ नहीं आती ।
शब्द समझ भी आए मगर,
वो 'बात' समझ नहीं आती ।
आज शब्दों के बवंडर में,
इस क़दर मैं फंसी हूँ ।
अपनी ही मन की व्यथा से,
स्तब्ध मैं खड़ी हूँ ।
कहना बहुत कुछ है मगर,
निःशब्द मैं खड़ी हूँ ।
मन की गहराइयों में,
अरसे बाद मैं उतरी हूँ ।
उतरते ही मैंने देखा,
मैं तो आज भी वही हूँ ।
थोड़ी-सी सरिता हूँ,
सुनामी भी थोड़ी हूँ ।
थोड़ी-सी हंसमुख हूँ,
चंचल भी थोड़ी हूँ ।
थोड़ी-सी बचकानी हूँ,
समझदार भी थोड़ी हूँ ।
थोड़ी-सी सरल हूँ,
जटिल भी थोड़ी हूँ ।
खुली किताब तो हूँ मगर,
मुश्किल भी थोड़ी हूँ ।
सबको समझ आ जाऊँ,
अख़बार थोड़ी हूँ ।
- मंजू
खूबसूरत कविता, मंजू।
ReplyDeleteThank you Manish Sir🙏
DeleteBeautiful manju
ReplyDeleteThank you 🙏🙏
DeleteAmazing❤️
ReplyDeleteThank you 🙏🙏🙏
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