Friday, March 18, 2022

मैं

वो कहते हैं मेरी 'बात',
बिल्कुल समझ नहीं आती ।

शब्द समझ भी आए मगर,
वो 'बात' समझ नहीं आती ।

आज शब्दों के बवंडर में,
इस क़दर मैं फंसी हूँ ।

अपनी ही मन की व्यथा से,
स्तब्ध मैं खड़ी हूँ ।

कहना बहुत कुछ है मगर,
निःशब्द मैं खड़ी हूँ ।

मन की गहराइयों में,
अरसे बाद मैं उतरी हूँ ।

उतरते ही मैंने देखा,
मैं तो आज भी वही हूँ ।

थोड़ी-सी सरिता हूँ,
सुनामी भी थोड़ी हूँ ।

थोड़ी-सी हंसमुख हूँ,
चंचल भी थोड़ी हूँ ।

थोड़ी-सी बचकानी हूँ,
समझदार भी थोड़ी हूँ ।

थोड़ी-सी सरल हूँ,
जटिल भी थोड़ी हूँ ।

खुली किताब तो हूँ मगर,
मुश्किल भी थोड़ी हूँ ।

सबको समझ आ जाऊँ,
अख़बार थोड़ी हूँ ।

- मंजू

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